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About

K K Parishad, Patna

के के परिषद, पटना

पटना, बिहार

के. के. परिषद का संविधान

1. संस्था का नाम : के. के. परिषद (कोचैसा कल्याण परिषद) होगा।

2. निबंधित कार्यालय : परिषद का केन्द्रीय कार्यालय पटना में रहेगा। किसी प्रकार का पता में परिवर्तन होने पर इसकी सूचना 15 दिनों के अन्दर निबंधक महानिरीक्षक बिहार, पटना एवं संबंधित संस्थाओं को दे दी जायेगी।

3. कार्यक्षेत्र : परिषद का कार्यक्षेत्र बिहार एवं झारखंड राज्य सीमा के अन्तर्गत होगा। इसे यह अधिकार होगा कि आवश्यकतानुसार पूरे क्षेत्र में शाखायें स्थापित करे तथा इसके संचालन का पूर्ण दायित्व कार्यकारिणी समिति को होगा।

4. परिषद का उद्देश्य :

  1. समाज को सुसंगठित कर आपस में प्रेम सहयोग एवं सद्भावना का विकास और उन्हें कार्यरूप देना। समाज के अन्य शाखाओं/संस्थाओं से भी समन्वय स्थापित करना।
  2. राष्ट्रीयता एवं देशभक्ति की भावना उत्पन्न कर देश की एकता एवं अखण्डता एवं स्वाधीनता की रक्षा करना। राष्ट्र के लोकतंत्र कार्यों में सहयोग करना एवं गड़बड़ी करने वालों के विरुद्ध आवाज उठाना।
  3. अन्तरराष्ट्रीयता, विश्वबन्धुत्व, समानता एवं स्वतंत्रता के आधार पर मानव कल्याण के मूल सिद्धान्तों को लागू करना।
  4. सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं शैक्षणिक चेतना का विकास करना। इस हेतु सत्-साहित्य का सृजन, सांस्कृतिक एवं खेल-कूद करने का आयोजन करना। समाज के विकास हेतु स्वस्थ साहित्यिक पुस्तकों एवं सामाजिक पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन, बिक्री एवं प्रचार-प्रसार करना। संस्था का कार्य बिना लाभ-हानि के सिद्धान्त पर आधारित होगा।
  5. समाज के युवा पीढ़ी को आगे बढ़ाने एवं उनके व्यक्तित्व के विकास हेतु प्रशिक्षण संस्थान, पुस्तकालय एवं वाचनालय की स्थापना करना। इस संस्था के सामाजिक दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए परिचर्चा गृह, न्यास, विद्यालय, महाविद्यालय, तकनीकी सहित अन्य सामाजिक संस्था का प्रबन्धन और प्रशासन करना।
  6. समाज के पुरुषों एवं महिलाओं को आत्मनिर्भर एवं स्वावलम्बी बनाने की दिशा में प्रेरित करते हुए उनके सर्वांगीण विकास हेतु वैज्ञानिक एवं तकनीकी ढंग से लघु-कुटीर एवं कृषि जनित उद्योगों की स्थापना को प्रोत्साहित करना एवं उन्हें प्रशिक्षित करना।
  7. समाज के निर्धन एवं मेधावी छात्र-छात्राओं को अग्रसर अध्ययन हेतु उन्हें उचित मार्गदर्शन एवं आर्थिक सहयोग प्रदान करना।
  8. समाज के सदस्यों को यथा समय असामाजिक तत्वों के खिलाफ सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना एवं समाज सेवा के लिए समर्पित व्यक्ति को चयन कर उन्हें सम्मानित करना।
  9. समाज में फैली दहेज प्रथा पर यथोचित नियंत्रण रखने हेतु फलोत्पादी प्रयास करना, विधवा विवाह को प्रोत्साहित करना, योग्य वर-वधुओं के बीच वैवाहिक सूत्र स्थापित करना।
  10. कृषकों को उन्नत खेती एवं उनकी आर्थिक उन्नति के लिए सुझाव एवं सहयोग देना। इनकी मूल समस्याओं की ओर सरकार का ध्यान आकृष्ट करना तथा समाधान का उपाय करना।
  11. परिषद कार्यालय एवं समस्त कार्यकलापों के लिए भूमि अर्जित कर भवन निर्माण करना।
  12. नगद या वस्तु रूप में कोई दान, अभिदान और संचय प्राप्त करना या किसी विधिक तरीके से अभिप्राप्त करना और इसे समाज के सभी या किसी उद्देश्य की पूर्ति पर खर्च करना। इस संस्था की आय और सम्पत्तियों को संस्था के उद्देश्यों की पूर्ति पर लगाना और इसके किसी भाग को लाभ, लाभांश या बोनस के रूप में संस्था नहीं करना।
  13. स्थावर या जंगम, सम्पत्ति या सम्पत्तियों या अधिकारों या विशेषाधिकारों को जो इस संस्था के सभी या किसी उद्देश्य को असर करने के लिए आवश्यक या लाभप्रद समझा जाय, क्रय द्वारा अर्जित करना, पट्टा या भाड़ा पर या दान में या अन्यथा लेना और धारित करना।
  14. वैसे सभी अन्य विधिक कार्य-कलाप और कार्रवाई करना जो सभी या किसी उद्देश्य की प्राप्ति में अनुषांगिक एवं सर्वांगीण विकास में सहायक हो।
  15. अन्य कोई ऐसा कार्यक्रम जो परिषद के उद्देश्यों की पूर्ति करने में सहायक हो तथा समाज के सर्वांगीण विकास में सहायक हो उसे करना।
  16. स्वजनों के बीच मदिरा पान, धूम्रपान, अंधविश्वास एवं अन्य कुरीतियों को अन्त करना। समाज के पिछड़ेपन को दूर करना एवं गरीबों के जीवन स्तर को ऊपर उठाना।
  17. कोई अन्य इस प्रकार की सामाजिक संस्था जिसका उद्देश्य इस संस्था के समान अथवा समरूप हो, उसे अधिग्रहण या एकीकृत करना।
  18. संस्था पूर्ण रूप से गैर-राजनीतिक होगी।

5. उद्देश्यों की पूर्ति के साधन : परिषद के प्रतिनिधि मंडल के निर्देशानुसार केन्द्रीय कार्य समिति उद्देश्यों की पूर्ति हेतु योजना बनाकर कार्यान्वयन करेगी।

6. के. के. परिषद का प्रबन्धन और नियंत्रण : 2 (दो) वर्ष पर आम सभा द्वारा निर्वाचित सोसाइटी की प्रबन्धन समिति के निर्णय द्वारा होगा और उसका प्रबन्ध समिति के द्वारा समय-समय पर विस्तारित या उपरिवर्तित नियमों के अनुसार किया जायेगा जिनके नाम, पता और वर्णन निम्नलिखित हैं। निम्नलिखित व्यक्ति इस सोसाइटी के प्रथम शासी निकाय के सदस्य होंगे।

7. परिषद का स्वरूप : के. के. परिषद का निम्नलिखित स्वरूप होगा।

  • (क) केन्द्रीय स्तर
  • (ख) राज्य स्तर
  • (ग) जिला स्तर
  • (घ) अनुमंडल स्तर
  • (ङ) प्रखंड स्तर
  • (च) पंचायत स्तर
  • (छ) ग्राम स्तर

8. के. के. परिषद के प्रतिनिधिमंडल द्वारा निर्वाचित कार्यसमिति द्वारा कार्य संचालन होगा जिसके कार्यान्वयन प्रमुख महासचिव होंगे। राज्य, जिला, अनुमंडलस्तरीय सचिव प्रदेश केन्द्रीय समिति के सदस्य होंगे तथा उन्हें मताधिकार होगा।

9. सदस्यता : कोई भी वयस्क कोचैसा परिषद के सदस्य हो सकते हैं जिन्हें परिषद के संविधान एवं उद्देश्य में आस्था होगी। सरकारी सेवा में रत व्यक्ति भी परिषद के सदस्य होंगे। सदस्यता निम्न प्रकार की होगी:

  1. वार्षिक सदस्य
  2. आजीवन सदस्य
  3. संरक्षक सदस्य

10. सदस्यता शुल्क : सदस्यता ग्रहण करने हेतु प्रथम बार 20/- रुपये प्रवेश शुल्क जमा करना आवश्यक होगा।

    • (क) वार्षिक सदस्यता शुल्क - 100/-
    • (ख) आजीवन सदस्यता शुल्क - 1000/-
    • (ग) संरक्षक सदस्यता शुल्क - 5000/-
  1. परिषद के कोष का गठन : सदस्यों से प्राप्त सदस्यता शुल्क, विशेष चन्दा, सहयोग राशि, अन्य अनुदान एवं शाखाओं से प्राप्त अंशदान से होगा।
  2. सभी प्रकार का कोष संग्रह के. के. परिषद पटना द्वारा निर्गत रसीद पर होगा।
  3. सदस्यता शुल्क एवं भर्ती शुल्क का विभाजन :
    • (क) प्रवेश शुल्क की पूर्ण राशि संग्रह करने वाले शाखा की होगी।
    • (ख) वार्षिक सदस्यता शुल्क से प्राप्त राशि का 30% अपने ऊपर की इकाई को देना आवश्यक होगा।
    • (ग) आजीवन सदस्यता शुल्क का 50% एवं संरक्षक सदस्यता शुल्क की पूर्ण राशि केन्द्रीय समिति की होगी। आजीवन सदस्यता शुल्क का 50% संरक्षक स्तर पर होगा।

11. परिषद का वित्तीय वर्ष :

  • (क) पहली जनवरी से 31 दिसम्बर तक।
  • (ख) सभी इकाई को वित्तीय वर्ष के प्रत्येक तिमाही के अन्दर संग्रहित राशि केन्द्रीय परिषद एवं अन्य संबंधित इकाई को नियमानुसार भेज देना आवश्यक होगा।

12. परिषद निम्नलिखित कार्यों पर व्यय करेगा :

  • (क) बैठक का आयोजन।
  • (ख) उद्देश्यों की पूर्ति।
  • (ग) कार्यालय के कामकाज।
  • (घ) समाज के विकास इत्यादि पर।

13.

  • (क) परिषद के प्रतिनिधि मंडल द्वारा निर्वाचित कार्यसमिति का कार्यकाल 2 वर्ष का होगा। इसके सभी इकाई का कार्यकाल भी 2 (दो) वर्ष का होगा।
  • (ख) प्रत्येक 2 वर्ष पर केन्द्र स्तरीय एवं सभी शाखा स्तरीय अधिवेशन होगा। इसी अधिवेशन में प्रतिनिधियों द्वारा निर्वाचन के माध्यम से अनुमंडल स्तर तक 1 दिसम्बर से 31 दिसम्बर तक, जिला एवं राज्य स्तर पर 1 जनवरी से 31 जनवरी तक एवं केन्द्रीय स्तर पर 20 मार्च तक कार्य समिति का गठन होगा।

14. केन्द्रीय एवं राज्य स्तरीय कार्य समिति के पदाधिकारी : अध्यक्ष - 1, उपाध्यक्ष - 2 (शहरी एवं ग्रामीण), महासचिव - 1, कोषाध्यक्ष - 1, संगठन सचिव - 1, सचिव शहरी - 1, सचिव ग्रामीण - 1, प्रचार सचिव - 1, कार्यालय सचिव - 1, कार्यकारिणी सदस्य - 5, कुल - 15। केन्द्रीय स्तर पर राज्य, जिला एवं अनुमंडल सचिव तथा राज्य स्तर पर जिला एवं अनुमंडल सचिव कार्यसमिति के विशेष सदस्य होंगे। (आवश्यकतानुसार पदों की संख्या घटाई या बढ़ाई जा सकती है।)

15. शाखास्तरीय : शाखास्तरीय इकाई के पदाधिकारी एवं कार्यसमिति के सदस्य : अध्यक्ष - 1, उपाध्यक्ष - 1, सचिव - 1, संगठन सचिव - 1, सहायक सचिव - 1, कोषाध्यक्ष - 1, कार्यकारिणी सदस्य - 5, कुल - 11।

16. परिषद के पदाधिकारियों के अधिकार एवं कार्य :

  1. अध्यक्ष :
    • (क) परिषद के स्वस्तरीय सभी बैठकों की अध्यक्षता करना एवं कार्यवाही पर हस्ताक्षर करना।
    • (ख) परिषद के कार्यों के कार्यान्वयन हेतु सलाह देना एवं निगरानी रखना।
    • (ग) महासचिव द्वारा बैठक नहीं बुलाने पर कार्यसमिति के 2/3 इकाइयों के (सदस्यों के) द्वारा अभिप्रेरित करने पर बैठक की तिथि एवं समय निर्धारित कर बैठक बुलाना।
    • (घ) किसी भी विषय पर कार्यसमिति की बैठक में बराबर-बराबर मत होने पर अपने मत से प्रस्ताव को स्वीकृत/अस्वीकृत करना।
  2. उपाध्यक्ष का अधिकार :
    • (क) परिषद में उपाध्यक्ष का पद केन्द्रीय एवं राज्य स्तर पर दो है। शेष स्तर पर एक है। अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उपाध्यक्षों पर उनके कार्यों का उत्तरदायित्व होगा तथा कार्यसमिति द्वारा सौंपे गये कार्यों का निर्देशन करना होगा। ग्रामीण उपाध्यक्ष का कार्य विशेष रूप से ग्रामीण स्तर पर परिषद के कार्य-कलापों का संचालन एवं संगठन करना होगा। शहरी उपाध्यक्ष शहरी क्षेत्र में परिषद के कार्य एवं संगठन के उत्तरदायी होंगे।
  3. परिषद के महासचिव के अधिकार एवं कार्य :
    • (क) परिषद के कार्यों के प्रति उत्तरदायी होंगे।
    • (ख) परिषद के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु क्रियाशील रहना।
    • (ग) बैठक बुलाने एवं कार्यवाही पुस्तिका रखने का उत्तरदायी होगा।
    • (घ) आय व्यय पर नियंत्रण रखना एवं सभी व्यय को स्वीकृति देना एवं प्रमाणक को पारित करना।
    • (ङ) एक हजार रुपये से ऊपर के प्रमाणक को कार्यसमिति की बैठक में स्वीकृति लेना।
    • (च) परिषद द्वारा लिये गये निर्णयों का संचालन एवं कार्यान्वयन करना।
  4. सचिव के कार्य एवं अधिकार : महासचिव के कार्यों में सहयोग करना तथा बैठक की कार्यवाही को अंकित करना एवं महासचिव द्वारा दिये गये कार्यों का निष्पादन करना एवं कराना।
  5. कोषाध्यक्ष :
    • (क) आय-व्यय का हिसाब रखना।
    • (ख) आय-व्यय का अंकेक्षण करवाना।
    • (ग) परिषद के अधीन व्यय का भुगतान महासचिव के निर्देश पर करना।
  6. संगठन सचिव : संगठन को मजबूत बनाने के लिए क्रियाशील रहना एवं संबंधित उपायों (कार्यकर्ता का कैडर विकास एवं उनका प्रशिक्षण) का कार्यसमिति में विचारार्थ रखना तथा नियमानुसार उनका संपादन करना।
  7. प्रचार सचिव : परिषद के कार्यों का प्रचार प्रसार करना एवं अधिकृत किये जाने पर परिषद के प्रवक्ता के रूप में कार्य करना।
  8. कार्यालय सचिव : परिषद के अभिलेख को सुचारू रूप से रखना, आवश्यकतानुसार प्रचार करना तथा महासचिव द्वारा सौंपे गये कार्यों का निष्पादन करना। इसके अतिरिक्त कार्यसमिति के संगठन सचिव, प्रचार सचिव के कार्यों का निर्धारण महासचिव के निर्देशानुसार आवश्यकतानुसार करेंगे।
  9. कार्यकारिणी समिति के सदस्यों के अधिकार एवं कार्य :
    • (क) कार्यकारिणी समिति के सदस्यों का कार्य एवं अधिकार का कार्यसमिति निर्धारित करेगी। सत्रावधि में किसी प्रकार की पद रिक्तियों को शेष अवधि के लिए भरने हेतु कार्यसमिति को मनोनीत करने का अधिकार होगा।
    • (ख) आवश्यकतानुसार उपसमिति गठित करना।

17. अंकेक्षक का कार्य :

  • (क) आय-व्यय की लेखा की जाँच तथा नियमित ढंग से लेखा रखने का सुझाव देना।
  • (ख) लेखा जाँच प्रतिवेदन कार्यसमिति के माध्यम से अधिवेशन में रखना।

18. अंकेक्षक की नियुक्ति : केन्द्रीय कार्यसमिति अंकेक्षक की नियुक्ति करेगी जिसकी संख्या कम से कम दो रहेगी, यही प्रक्रिया शाखा स्तर पर भी लागू होगी।

19. परिषद के आय के स्रोत :

  • (क) प्रवेश शुल्क
  • (ख) वार्षिक सदस्यता शुल्क
  • (ग) आजीवन सदस्यता शुल्क
  • (घ) संरक्षक सदस्यता शुल्क
  • (ङ) सहयोग राशि, अनुदान, विज्ञापन, कल्याण संबंधित योजना से जमा राशि के मद, शाखा से प्राप्त अंशदान से तथा समाज के मनुष्यों द्वारा दिये गये दान से।

20. कोष संरक्षण :

  • (क) परिषद के नाम प्राप्त धनराशि एक सप्ताह के अन्दर बैंक में जमा कर दी जायेगी। बैंक का खाता संचालन परिषद के अध्यक्ष, महासचिव, कोषाध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष में तीन सदस्यों के संयुक्त हस्ताक्षर से होगा, जिसमें कोषाध्यक्ष एवं महासचिव का हस्ताक्षर अनिवार्य होगा।
  • (ख) कोष संचालन के लिए अध्यक्ष/महासचिव बैंक में भेजे जाने वाले व्यक्तियों का हस्ताक्षर अभिप्रमाणित कर बैंक को देंगे।
  • (ग) साधारण व्यय के लिए महासचिव एक हजार रुपया स्थायी अग्रिम के रूप में अपने पास रखेंगे।
  • (घ) केन्द्रीय कार्यसमिति के निर्णय से किसी भी राष्ट्रीयकृत बैंक में परिषद का खाता खोला जायेगा।

21. व्यय :

  • (क) कार्यसमिति द्वारा स्वीकृत बजट के अनुरूप व्यय होगा।
  • (ख) आय-व्यय का लेखा त्रैमासिक कार्यसमिति की बैठक/अधिवेशन में प्रस्तुत किया जायेगा।

22. कार्यसमिति से निष्कासन :

  • (क) साधारणतया कार्यसमिति के लगातार तीन बैठकों में अकारण अनुपस्थित रहने से सदस्यों का स्थान स्वतः रिक्त समझा जायेगा एवं उस रिक्त स्थान की पूर्ति कार्यसमिति कर लेगी।
  • (ख) परिषद की प्रतिष्ठा भंग करने वालों को कार्यसमिति अविलम्ब हटा देगी।

23. बैठक की सूचना : आम सभा प्रत्येक माह के अन्तिम रविवार को होगी। कार्यसमिति की बैठक भी प्रत्येक माह में अन्तिम रविवार के ठीक पहले वाले रविवार को होगी। बैठक की सूचना आहूत तिथि से 15 दिन पूर्व एवं प्रतिनिधि मंडल द्वारा अधिवेशन बुलाने की सूचना एक माह पहले होनी चाहिए। विशेष परिस्थिति में समय का बंधन नहीं होगा। कार्यसमिति की बैठक की गणपूर्ति की संख्या 50% होगी।

24. संविधान संशोधन : संविधान संशोधन का अधिकार केन्द्रीय प्रतिनिधिमंडल में निहित होगा जिसे आवश्यकतानुसार समय-समय पर संशोधन किया जा सकता है।

25. सदस्यता ग्रहण करने के लिए आवश्यक शर्तें : अपने समाज के बालिग लोग ही इस परिषद के सदस्य हो सकते हैं।

26. सदस्य से निवृत्ति :

  • (क) सदस्यता शुल्क नहीं जमा करने पर।
  • (ख) त्याग-पत्र प्रस्तुत करने पर।
  • (ग) पागल, दिवालिया या जघन्य अपराधी होने पर।
  • (घ) मृत्यु हो जाने पर।

27. प्रतिनिधिमंडल का गठन :

  • (क) केन्द्रीय प्रतिनिधिमंडल का गठन : संरक्षक सदस्य, आजीवन सदस्य, राज्यस्तरीय अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महासचिव एवं कोषाध्यक्ष तथा जिला स्तरीय सचिव, केन्द्रीय प्रतिनिधिमंडल के सदस्य होंगे जिन्हें मतदान का अधिकार होगा।
  • (ख) राज्य प्रतिनिधि मंडल का गठन : आजीवन एवं संरक्षक सदस्य, केन्द्रीय समिति के पदाधिकारीगण तथा जिला स्तरीय अध्यक्ष एवं सचिव राज्य प्रतिनिधिमंडल के सदस्य होंगे जिन्हें मताधिकार होगा।
  • (ग) जिला/अनुमंडल स्तर प्रतिनिधिमंडल का गठन : जिला/अनुमंडल के संरक्षक सदस्य, आजीवन सदस्य, राज्य समिति के सदस्यगण, प्रखण्ड स्तरीय अध्यक्ष एवं सचिव जिला स्तर पर तथा पंचायत स्तरीय सचिव अनुमंडल स्तरीय प्रतिनिधिमंडल के सदस्य होंगे जिन्हें मताधिकार होगा।
  • (घ) प्रखण्ड स्तरीय प्रतिनिधिमंडल : प्रखण्ड के संरक्षक सदस्य, आजीवन सदस्य तथा पंचायत तथा ग्राम स्तर कार्यसमिति के अध्यक्ष एवं सचिव प्रतिनिधिमंडल के सदस्य होंगे जिन्हें उक्त स्तर पर मताधिकार होगा।

28. विषय निर्धारण : कार्य समिति में निहित होगा।

29. परिषद के प्रतिनिधिमंडल का बैठक सभी स्तर पर वर्ष में एक बार होगा जिसका निर्धारण संबंधित कार्यकारिणी करेगी। गणपूर्ति के लिए कुल प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों का पचास (1/5) होगा तथा अधिवेशन दो वर्ष पर होगा। खुला अधिवेशन में उपस्थित वार्षिक, आजीवन एवं संरक्षक सदस्यों को मताधिकार होगा।

30. प्रतिनिधिमंडल के अधिकार एवं कार्य :

  • (क) केन्द्रीय प्रतिनिधिमंडल के अधिकार एवं कार्य :
    • (क) संविधान में आवश्यकतानुसार समय-समय पर संशोधन करना।
    • (ख) केन्द्रीय कार्यसमिति का निर्वाचन।
    • (ग) परिषद के हितार्थ प्रस्ताव पेश करना एवं पारित करना।
  • (ख) राज्य प्रतिनिधिमंडल का अधिकार एवं कार्य :
    • (क) राज्य कार्यसमिति का निर्वाचन करना।
    • (ख) परिषद के हितार्थ प्रस्ताव पेश करना एवं पारित प्रस्ताव को केन्द्रीय समिति के पास आवश्यक कार्रवाई हेतु भेजना।
    • (ग) नीचे के स्तर के कार्यों पर निगरानी रखना।
  • (ग) जिला/अनुमंडल/प्रखण्ड/पंचायत एवं ग्राम स्तरीय प्रतिनिधिमंडल :
    • (क) स्वस्तरीय कार्यसमिति का निर्वाचन करना।
    • (ख) परिषद के सदस्यों के हितार्थ प्रस्ताव पेश करना एवं पारितों उपरान्त अनुमोदनार्थ राज्य एवं केन्द्र स्तर पर भेजना।

31. चुनाव प्रकोष्ठ का गठन : परिषद की केन्द्रीय कार्यसमिति तीन सदस्यीय चुनाव प्रकोष्ठ बनाकर चुनाव संबंधी विवाद का निराकरण कर सकती है जिसका निर्णय अंतिम होगा।

32. विभिन्न स्तरीय शाखाओं का विघटन : विशेष परिस्थिति में केन्द्रीय कार्यसमिति किसी भी राज्य/जिला/अनुमंडल/प्रखण्ड/पंचायत एवं ग्रामीण स्तरीय कार्यसमिति का कोई पदाधिकारी को क्रमशः विघटित/पदच्युत कर सकती है तथा नया चुनाव होने तक तदर्थ समिति का गठन कर देगी।

33. स्वागत समिति :

  • (क) आमसभा की तिथि से दो माह पहले कार्यसमिति स्थानीय सदस्यों के द्वारा आवश्यकता पड़ने पर स्वागत समिति का गठन करेगी।
  • (ख) स्वागत समिति के सदस्य वही होंगे जो परिषद के कम से कम आजीवन सदस्य होंगे।

34. परिषद के शाखा का चुनाव : राज्य स्तरीय कार्यसमिति का चुनाव केन्द्रीय कार्यसमिति द्वारा मनोनीत पर्यवेक्षक की देख-रेख में होगा तथा जिला एवं अनुमंडल एवं अन्य निम्न स्तरीय चुनाव राज्य स्तरीय समिति द्वारा मनोनीत पर्यवेक्षक की देख-रेख में संपन्न होगा।

35. सभी स्तर पर निर्वाचन के सात दिनों के अन्दर पुराने पदाधिकारी संबंधित निर्वाचन पदाधिकारी को पूर्णरूपेण प्रभार सौंप देंगे तथा अपने पद से हट जायेंगे।

36. अधिवेशन के समय भी अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष ही सभा की अध्यक्षता करेंगे। नव निर्वाचित कार्य समिति के सदस्य अधिवेशन स्थल पर ही तुरन्त शपथग्रहण कर लेंगे।

37. कानूनी कार्रवाई : परिषद के द्वारा या विरुद्ध महासचिव (पटेन) के नाम से होगा। संस्था से संबंधित किसी भी मुकदमे का संचालन का उत्तरदायित्व संबंधित स्तर के महासचिव पर होगा जो कार्यसमिति के निर्देशानुसार अपने कर्तव्य को पूरा करेगा और मुकदमें संबंधित आवश्यक पैरवी स्वतः या अधिकृत व्यक्ति से करायेगी तथा संस्था का प्रतिनिधित्व न्यायालय में करेगा।

38. संस्था के विघटन और विघटित सम्पत्ति का निस्तारण : संस्था में विघटन एवं विघटित सम्पत्ति के निस्तारण की कार्यवाही सोसाइटी रजिस्ट्रेशन के धारा 13 एवं 14 के अन्तर्गत की जायेगी।

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