1. कोचैसा कुर्मी—उद्गम एवं विस्तारः—
कोचैसा सामान्यतः एक कोचैसा गोत्र का बहुकोणीय और पूर्ण मनुष्य के रूप में उद्भवित विकास और उपनाम का प्रक्रिया की ओर तक की संज्ञा रखी गयी है। यद्यपि चन्देल, गंगोहिया, निरंगी, शिवन, औद्यान आदि होमिनिड के ही दो-पाये मनुष्य में रूपान्तर हैं।
इसलिए निर्गत जातित्व के शब्दों में “आदमी को न समझकर हुआ इंसान अर्थात निहायत शरीफ होना।” अपने पशु-पूर्वजों से संबंध विच्छेद करने वाले पूर्व-ऐतिहासिक आदिमानव एक परिवर्तनशील थे जो कालानुकूल पत्ता, छाल, कपड़ा पहनने एवं किलकिलाहट के बजाय एक बोली, भाषा बोलने का उन्नतोन्मुख विकास करते गए।
सन 1926 ई० के आस्ट्रेलिया में एक खुदाई के दौरान प्राप्त 53 फीट लम्बा जीव के पेड़ का फॉसिल पटना संग्रहालय में धरा-शरीरों की लम्बी-चौड़ी फेहरिस्त एवं देश का अकेला पुरातत्त्विक मौजूद है जो पैलियोजोयिक आर्किय इहोता द्वारा 20 करोड़ वर्ष से ज्यादा पुराना है, जबकि मानव की उत्पत्ति दो करोड़ वर्ष पुराना की है।
पृथ्वी की उम्र 4.6 अरब साल आंकी गई है। पाषाण-काल 3500 ई०पू० से 5000 ई०पू० माना जाता है। इस समय आदमी शिकारियों एवं घुमक्कड़ था। शिकार पकड़ने एवं हिंसक पशुओं से रक्षा करने के कारण कुदरा मनुष्य का प्रथम हथियार था। धातु युग 3500 ई०पू० से 2000 ई०पू० तक था। इस समय मनुष्य खेती एवं पशुपालन करता था। 3500 ई०पू० से 2000 ई०पू० तक सिन्धु-घाटी के मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा में चारदीवारीयुक्त शहरी सभ्यता चरमोत्कर्ष पर थी, जिसका संबंध इराक की मेसोपोटामिया सभ्यता से था।
कुर्मी-कुड़म शब्द जानते के आदि पुरुष थे। धरा पर समस्त प्रजाति कुर्मी-कुड़म से उत्पन्न होने के सबल सूत्र हैं। सम्पूर्ण मानव जाति का सृजन करना उचित ही है। कुर्मी क्षत्रिय जाति के आज भी अपने पूर्वज का नाम धारण करके कुर्मी को अमर कर दिया है। कुर्मी-कुड़म को संतान कुर्मी जाति उस आदि पुरुष के नाम पर स्वयं को कर्मवंशी, कर्मी, कुड़म और कुड़म गोत्री आदि मानती है।
कर्म का शाब्दिक अर्थ कर्मशीलता और कुड़म का “दृढ़” है। सृष्टिकर्ता को “कुर्म” कहा जाता है क्योंकि उसमें श्रेष्ठ कर्मशीलता एवं पराक्रम है। साथ ही वह महान ज्ञानी, सर्वदृष्टा और सूक्ष्मदर्शी है, उसी से उसे “कुर्म” की संज्ञा प्राप्त है। इस प्रकार कुड़म और कर्म दोनों एक ही शक्ति के दो पहलू हैं।
कछुआ ने मध्य एशिया में अपना उपनिवेश स्थापित कर उसका नाम कश्यप द्वीप रख दिया। कछुआ को उन्नत अवस्था में लाने का श्रेय कश्यपों को ही है। इसी से कछुआ को कच्छपों की भूमि कहते हैं। कश्मीर में “कश्यपाजार” नामक खूबसूरत स्थान आज भी कश्यप की कीर्ति कथा में चर्चित होता रहता है। कश्यप (कास्पियन) पर्वत, कछुआ जलधि एवं कूर्म कीर्ति पर की छाप है, क्योंकि ये भी कूर्म-कश्यप के ही अधिकार क्षेत्र में थे। कूर्म की सत्ता में अधीन रहते के कारण कूर्मानिल-उत्तरापथ में एक प्रदेश का नाम कूर्मांचल पड़ गया था जिसे आज कुमाऊँ की संज्ञा दी गई है। गंगोत्री शिवकाशी से कुमाऊँ महान हिमालय प्रदेश है जो मुख्यतः पश्चिमी भारत में है। यह मध्य के तेलंग प्रदेश के जनपद, बेलगाम के कुल्ली, दक्षिणी कोकण में कुलवेली, गुजरात में कच्छी तथा भोज क्षेत्र में पाटीदारों के रक्तसमूह हैं।
ऐतिहासिक दृष्टि से मगध एवं दक्षिणवर्ती कुलों समान हैं। दोनों में विशिष्ट मौलिक वैदिक गुण हैं।
कुर्मी जाति विशुद्ध क्षत्रिय वर्ण की है क्योंकि क्षत्रियता के संपूर्ण प्रमाण वायु जाति में समाहित हैं। कुर्मी आज उच्च भारत की जनसंख्या का भार उसी तरह से उठाये हुए हैं जिस प्रकार कुर्मी से पृथ्वी का भार उठाया था।
“कुर्मी का जीवन कर्मशीलता, साहस, संग्राम, संघर्ष, आशा, उमंग एवं उत्साह का होता है। वह साहस के साथ संघर्षों का सामना करता है। वह संसार में परिस्थितियों का कभी दास नहीं बनता, अपितु उनका स्वामी बनकर जीवन को ज्योतिमय बना लेने में समर्थ होता है। वह मंगलमय, आशामय उदात्त भावनाओं का केन्द्र है। वह अब चारों ओर न केवल अपनी जाति में, न केवल अपने देश या राष्ट्र में, व केवल पृथ्वी पर अखिल सम्पूर्ण विश्व में सुख, शान्ति, सौमनस्य, सौहार्द एवं प्रकाश का साम्राज्य चाहता है। उसका दृष्टिकोण अत्यधिक विशाल होता है।”
— ऋग्वेद
“चन्द्रवर्चस्वी ये कूर्मियों को सूर्य सदृश तेजस्वी एवं दिव्यताओं की तरह सामर्थ्यवान बनाता है।”
नोट: यह पाठ स्कैन की दृश्य-पठन के आधार पर टाइप किया गया है। मूल पुस्तक में धुंधले/अस्पष्ट शब्दों के कारण कुछ शब्दों की वर्तनी सत्यापन योग्य है।
“कठोरता” “चन्द्रवर्चस्वी ये कूर्मियों को सूर्य सदृश तेजस्वी एवं दिव्यताओं की तरह सामर्थ्यवान बनाता है।”
2000 ई०पू० में आर्यों का उदय हुआ जिसकी एक शाखा पंजाब, दूसरी कश्मीर शाखा आकर सिंधु-सतलज और मध्य एशिया के बीच विस्तृत हुई। इस काल में मूल निवास-स्थान मध्य एशिया, वोल्गा गंगाधर क्षेत्र आदि का उल्लेख मिलता है। आर्यों के आगमन, उनके संघर्ष, राज्यों और सामाजिक व्यवस्था के संबंध में लेखक ने विभिन्न ऐतिहासिक प्रसंगों का वर्णन किया है।
इस काल में युद्धों में रथों और घोड़ों का प्रयोग हुआ। युद्ध-व्यवस्था और सैन्य संगठन में परिवर्तन आया। लेखक के अनुसार प्राचीन भारतीय समाज में अलग-अलग समूहों और राज्यों का विकास इसी क्रम में हुआ।
भारत का सर्वप्रथम समाजवादी परम्परा तथा महाभारत युद्ध को एक समाजवादी बदलाव माना गया है जिसके फलस्वरूप भारत की राजधानी का बदलाव दिल्ली से राजगृह, पाटलिपुत्र हुआ और नन्दवंशीय राजाओं जैसे विभिन्न राजवंशों का उदय हुआ।
महाभारत के पश्चात अनेक सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन हुए। वर्ण-व्यवस्था का स्वरूप बदला और ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र के रूप में समाज का विभाजन बताया गया है। ब्राह्मण का कार्य धार्मिक कर्म तथा वेदों का अध्ययन-अध्यापन माना गया। इस काल में आयुर्वेद, अर्थवेद, सामवेद एवं उपनिषदों की रचना हुई तथा विभिन्न धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं का विकास हुआ।
बुद्ध एवं महावीर काल में सामाजिक विरोध और धार्मिक परिवर्तन का वर्णन किया गया है। लेखक ने ब्राह्मणवाद और तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के विरोध में बुद्ध और महावीर के प्रभाव का उल्लेख किया है।
“कोचैसा” शब्द तत्कालीन भाषा का “कोच” एवं वाचक है और “ईश” स्वामी, अधिष्ठाता वाचक है। दोनों मिलाकर कोचैसा ऐसा सामाजिक शब्द बना हुआ है और गढ़वई बोली में कोचैसा शब्द से मिला जाता है अर्थात राजा कुर्मी खान के रथ पर चढ़कर युद्ध करनेवाला स्थान परम्पर सैन्यक कर्मवंशी क्षत्रिय के वाचक कोचैसा कुर्मी शब्द है।
इसका गांव कछुआ है। जैसा कि बेटवाड़ी पंडित बद्रीनारायण प्रसाद सिंह ने 1991 में प्रकाशित अपनी लिखित पुस्तक “कोचैसा क्षत्रिय वंश शिरोमणि” में वर्णन किया है कि हमारे पूर्वज गुजरात स्थित कच्छ से आने के कारण ही कोचैसा कहलाने लगे।
हमारी पिछली तथा हमारे पूर्वज एक ही मूल गोत्र के हैं। मध्यकाल के कोचका घाट-महस्ता इलाके से बाजजी भौंसले के खानदान के विस्तार होने पर तथा बादशाह आक्रमण के समय खेती की अनिश्चितता होने पर ये लोग राजस्थान के जयपुर, भरतपुर और अलवर जिले के कोचैसा, कोटवाड़ा, सिरसाई, भोजपुर, चितौड़गढ़, नोड़ी, मनकोरम, करछ, रेयारी, बनेली, बातर, हेलना और भरतपुर आदि गाँवों में आ बसे।
2. कोचैसा जाति का विंध्य के नागालैंड जिला में सर्वप्रथम आगमन:—
सन 1550 ई० में दिल्ली पर मुगलिया शासन था और बिहार भी उसी के अधीन था। बिहार के हिन्दू सूबेदार हेमचन्द्र की राजधानी रोहतासगढ़ थी। लेखक ने हेमचन्द्र और मुगल शासन के संघर्ष तथा उस समय के सामाजिक-राजनीतिक परिवेश का उल्लेख किया है।
इस युद्ध और संघर्ष में अनेक सिपहसालार तथा पूर्वजों के लोग शामिल थे। हेमचन्द्र और मुगल सेना के बीच संघर्ष के बाद विभिन्न परिवारों का विस्थापन हुआ और वे बिहार के अलग-अलग क्षेत्रों में जाकर बस गये।
लेखक के अनुसार हमारे पूर्वजों का आगमन इस क्षेत्र में इसी ऐतिहासिक क्रम में हुआ। उनके साथ कई परिवार और सहयोगी भी आये। खेती, पशुपालन और स्थानीय संसाधनों के आधार पर उन्होंने नये गाँवों और बस्तियों की स्थापना की।
इस मत के विरुद्ध निम्न आपत्तियाँ हैं:— 1. जब रोहतासगढ़ पर इस्लाम का कब्जा हो गया तब रोहतास जिले में ही दुश्मनों को सिर उठाने की काफी उम्मीद थी। अतः रोहतासगढ़ में ही राजधानी बनाकर विरोधियों को वहाँ बसाया जाना चाहिए था, न कि बिहारशरीफ के इलाके में। 2. चूँकि इस्लाम सूफी संत थे, हमारे समाज पर सूफीमत का प्रभाव होना चाहिए था किन्तु सूफीमतावलंबियों के बजाय कबीरपंथी अनुयायियों का प्रभाव अधिक है। 3. हमारी जाति बहुत ही स्वाभिमानी है। हमारे पूर्वज सिराजी मुगलों के विरुद्ध लड़े। अतः हिन्दू बादशाह के विरुद्ध युद्धरत मुगल तुर्कों के पक्ष में लड़ना पाप नहीं माना जा सकता। 4. मात्र 13 सिपहसालारों से 650 वर्षों में हमारी इतनी आबादी सम्भव नहीं है। 5. हमारा मत है कि राजस्थान के जयपुर, भरतपुर और अलवर जिले में हमारे पूर्वजों की काफी संख्या के अनुपात में बहुत थोड़ी आबादी यहाँ कभी थी।
लेखक आगे राजस्थान और अन्य क्षेत्रों से पूर्वजों के आगमन का वर्णन करता है। उनके अनुसार अनेक परिवार अलग-अलग समय में बिहार आए और खेती तथा व्यापार से जुड़े। राजस्थान में इन लोगों की स्थिति, उनके गाँवों तथा सामाजिक संबंधों का उल्लेख किया गया है।
“हमारा भविष्य हमारे हाथ में है।”
इस संदर्भ में नालन्दा विश्वविद्यालय का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया गया है। इसका स्थापना काल लगभग 415-455 ई० के बीच बताया गया है। यह बौद्ध धर्म का अन्तरराष्ट्रीय केन्द्र था। मध्ययुग में विदेशी आक्रमणों के कारण इसका विनाश हुआ। यहाँ दूर-दूर से विद्यार्थी अध्ययन के लिए आते थे।
यहाँ वेद, तर्कविद्या, व्याकरण, चिकित्सा-विज्ञान, शब्द-विद्या, योग, न्याय और बौद्ध धर्म की शिक्षा दी जाती थी। यहाँ के प्रसिद्ध आचार्यों और विद्वानों का भी उल्लेख है।
साधारण ज्ञान के सैकड़ों शिक्षक विद्यार्थियों को शिक्षा देते थे। विश्वविद्यालय के विशाल पुस्तकालय और विभिन्न विषयों की शिक्षा का वर्णन मिलता है। लेखक ने नालन्दा को प्राचीन भारत के प्रमुख ज्ञान-केंद्र के रूप में प्रस्तुत किया है।
सन 1793 ई० में अंग्रेज शासक लॉर्ड कार्नवालिस द्वारा जमींदारी प्रथा लागू की गई। गाँव की सारी जमीन के मालिक जमींदार हो गए। उस समय प्लेग, चेचक, हैजा आदि महामारियों का प्रकोप था। ग्रामीण जीवन कठिन था और चिकित्सा-सुविधाओं का अभाव था।
हमारे समाज के लगभग 550 गाँवों में सामाजिक जीवन अलग-अलग परिस्थितियों में विकसित हुआ। राजगृह-बिहारशरीफ-अस्थावाँ-बिन्द-बाढ़ रोड से संबंधित गाँवों और उनके भौगोलिक क्षेत्र का वर्णन किया गया है।
हमारे सारे गाँवों का नाम प्रमुखतः कोचैसा समाज के गाँवों के रूप में बताया गया है। लेखक आगे इन गाँवों का विस्तृत विवरण आगामी पुस्तक में प्रकाशित करने की बात करता है।
लॉर्ड डलहौजी द्वारा भूमि की स्थायी व्यवस्था तथा आजादी-प्राप्ति के बाद किसानों की जमीन और खेती की परिस्थितियों में बदलाव का वर्णन किया गया है। बिहार में जमींदारी प्रथा समाप्त होने के बाद किसानों की स्थिति में परिवर्तन आया।
लेखक के अनुसार हमारे समाज के लोग विभिन्न क्षेत्रों में खेती और रोजगार से जुड़े। समय के साथ सरकारी सेवाओं तथा अन्य व्यवसायों में भी समाज के लोग आगे आए। देश के विभिन्न शहरों—दिल्ली, मुंबई, भोपाल, बंगलौर, कोलकाता आदि—में समाज के लोगों की उपस्थिति का उल्लेख है।
अमेरिका के कैलिफोर्निया में भव्य मंदिर का निर्माण करने वाले तथा अमेरिका में पुलिस/कानून-व्यवस्था से जुड़े समाज के व्यक्तियों का भी उल्लेख किया गया है।
विशिष्टता प्राप्त हमारे गाँवों की सूची:— आबादी वाला गाँव — नाहुब, चण्डी, पटना नौकरी वाला गाँव — अरई, बेलौपुर शहर में मकान वाला गाँव — बलवापुर उद्योग वाला गाँव — चित्तरविगहा एजेंसी वाला गाँव — गौरियापुर, बलवा गहन खेती वाला गाँव — प्रेमन बिगहा नारी शिक्षा अग्रगण्य गाँव — नीमपुर (नालन्दा) आलू उत्पादक गाँव — मदार
प्याज उत्पादक गाँव — बड़हरी सब्जी उत्पादक गाँव — डोइया खनिजों उत्पादक गाँव — जगतपुर जमींदारी गाँव — गुंजरचक क्रांतिकारी गाँव — चित्तरविगहा राजनीतिक गाँव — बोधिबिगहा-महमदपुर नया गाँव — केसौरा पंचायत हुआ गाँव — महेशपुर बड़ा गाँव — बड़ौना लघु महाभारत गाँव — बरनारा सामूहिक हत्या का गाँव — बेलौटी, मनारा आबादी समाप्त गाँव — बरबीघापुर, वृन्दावन पढ़ने के नजदीक गाँव — देवकली
विश्व की धरती नालन्दा बौद्ध, जैन एवं हिन्दू धर्म की संगम भूमि है। राजगृह, बिहारशरीफ, अस्थावाँ, परवलपुर आदि क्षेत्रों तथा नालन्दा जिले के पावन इतिहास का वर्णन किया गया है।
लेखक के अनुसार प्राचीन नालन्दा का क्षेत्र वर्तमान नालन्दा और पटना के कुछ हिस्सों में फैला था। गाँवों की बसावट नदियों और तालाबों के किनारे हुई क्योंकि वहाँ जल और उपजाऊ भूमि उपलब्ध थी।
ऊँची भूमि पर बसे गाँवों में जल की उपलब्धता और खेती की समस्या का उल्लेख है। कालान्तर में आबादी बढ़ने और खेती योग्य भूमि की कमी के कारण लोगों ने दूसरे क्षेत्रों में जाकर गाँव बसाए। इसी कारण समाज के गाँव अलग-अलग क्षेत्रों में फैले।
3. कोचैसा कुर्मी की जातिगत विशेषताएँ:—
हमारी जाति का इतिहास, संस्कृति व सभ्यता अत्यन्त गौरवपूर्ण एवं गौरवशाली रहा है। संख्या कम होने के बावजूद भी गुणात्मक दृष्टि से हमारा महत्व किसी भी अन्य समाज से कम नहीं है। भारत में कुर्मीवंशी क्षत्रियों की जनसंख्या 7 करोड़ से अधिक है, जो सम्पूर्ण आबादी का लगभग 8.25% और भारत की 6 प्रमुख राष्ट्रीय जातियों में एक है। कोचैसा कुर्मी उन्हीं कुर्मी जाति की शाखा है।
हमारे पूर्वज आज से लगभग 600 वर्ष पहले भारत के पश्चिमी क्षेत्र से आये। इनके बारे में निम्न बातें उल्लेखित हैं:— 1. कोचैसा कुर्मी अन्य कुर्मियों की भाँति बहुत परिश्रमी हैं। कृषि के गुर के अलावा इस जाति को खेती के व्यापक जमीन बनाने में अहम भूमिका है—चाहे गुजरात, राजस्थान व बिहार का मामला क्यों न हो। 2. मेहनती के साथ-साथ यह जाति बुद्धिमान भी उतनी ही है। आरंभ में हमारे व्यवसाय खेती-भूमि के सिवा नदियों के बीच की उपजाऊ जमीन, जलीय भूमि आदि से जुड़े थे।
पुराने समय में कहा गया है— “जहाँ-2 धन उपजत भारी, कुर्मी वहाँ भूमि अधिकारी।”
आधुनिक समय में जब कृषि की हालत खराब हुई है, फसल का लागत मूल्य बढ़ा है और बाजार में सही मूल्य नहीं मिलता, तब समाज के लोगों ने रोजगार के दूसरे क्षेत्रों में प्रवेश किया। प्रशासनिक एवं व्यावसायिक सेवा में कोचैसा समाज के लोग आगे आए हैं।
3. वाकई इस जाति का दिमाग गणितीय है यानी हिसाब में बहुत तेज। यही कारण है कि इस जाति में अधिकांश लोग डॉक्टर की अपेक्षा इंजीनियरिंग तथा तकनीकी क्षेत्रों में अधिक रुचि रखते हैं। 4. इस जाति के अधिकांश लोग सीधे-सादे हैं। खान-पान, रहन-सहन भी सादा है। यदि बाहर से आने वाले बहुत कम लोगों की कुटिलता इतिहास में दिखाई देती है तो वह उनकी अपनी कमजोरी नहीं बल्कि सरल स्वभाव का परिणाम है।
लेखक जाति के लोगों को शिक्षा, आर्थिक विकास और सामाजिक सुधार की ओर ध्यान देने की आवश्यकता बताता है।
एक लोक-पंक्ति: “कुर्मी वाले कुर्मी के पीछे, कुर्मी नहीं खाइ के पीछे। कुर्मी बढ़े कुड़म के द्वारे, कौन न रहा जिए साथ हमारे।”
अपवाद है, इससे दुराचारी का मनोबल बढ़ता है। मानव स्वभाव सिंह जैसा हिंसक और बकरी जैसा सीधा-सादा नहीं होना चाहिए। दोनों में बराबर है। मध्यम मार्ग अपनाना जरूरी है।
यह जाति आक्रामक बनाम बचाव की लड़ाई लड़ने के कारण तटस्थता से प्रभावित है। यह जाति प्रायः किसी से भिड़ाई नहीं करती है।
“मुझे से सभी तक उठना चाहिए, जब तक वह दूर हो किन्तु जब वह पास से आ जाए तो निश्चित होकर उससे लड़ना चाहिए।” — चाणक्य
“प्रतिशोध न करना जो मौन अत्याचार का, जिसे लाल खून में वही आग कहाँ गर्मी है। जिसे रगों में है, समय ठंडी मस्तक वही, निकम्मी, निकम्मी नहीं, वही कुर्मी है।” — रामधारी सिंह ‘दिनकर’ (स्कैन में श्रेय अस्पष्ट)
शांतिप्रिय जातिव्यवस्था के चलते यह जाति शांतिपूर्ण समाजवाद का समर्थन करती है। लेखक सामाजिक न्याय, समानता और श्रम के महत्व पर बल देता है। समाज में खेती करने वाले और श्रमिक वर्गों के योगदान को महत्वपूर्ण बताया गया है।
6. इस समाज में त्याग एवं परोपकार की भावना की कमी है। प्रदर्शनशील पदार्थ, मद्यपान-धूम्र, चाय, ताड़ी, वायु, वृक्ष, नदी सभी परोपकार में लगे हुए हैं। प्रकृति की श्रेष्ठतम सृष्टि-मनुष्य को त्याग एवं परोपकार में कोताही बरतना जघन्य अपराध है। अपनी आमदनी का एक हिस्सा भी समाजहित में खर्च नहीं करते।
“यही पशु प्रवृत्ति है कि आप-ही-आप चरे, वही मनुष्य है जो मनुष्य के लिए मरे। जिए सदा औरों तक पहुँचते, तथा परार्थी पीर सहते। ऐसे नर श्रेष्ठ-देव कहलाते, स्वर्ग इसी जीवन में पाते।”
लेखक विदेशों में बसे भारतीयों और उनके सामाजिक सहयोग का उदाहरण देता है। समाज में सामूहिकता, दान और सहयोग की भावना विकसित करने की आवश्यकता बताई गई है।
इस मामले में मारवाड़ी एवं इस्लाम समाज से सीख लेने की बात कही गई है। लेखक के अनुसार व्यक्ति को समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए और अपनी आय का कुछ भाग समाज-कल्याण में देना चाहिए।
खेती और मजदूरी से जुड़े लोगों की कठिनाइयों का उल्लेख करते हुए लेखक कहता है कि किसानों और मजदूरों का योगदान राष्ट्रीय आय में महत्वपूर्ण है, फिर भी उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर रहती है। समाज में एक कल्याणकारी कोष बनाने की आवश्यकता बताई गई है।
प्रवेश परीक्षा पास की। अर्थाभाव के कारण वहाँ के सभी विद्यालयों में आठ आने प्रतिदिन के हिसाब से उसे सहायता करते थे। अपने समाज में एक मजदूर की बच्ची का नामांकन एम०बी०बी०एस० में होने पर समाज द्वारा मदद का प्रयास किया गया। लेखक इसे अनुकरणीय उदाहरण बताता है।
7. इस जाति का अभिमान अर्थात आन-बान और शान बहुत ज्यादा और स्वाभिमान कम है, हालांकि बहुत से स्वाभिमानी लोग चाहिए। अहंकार के पीछे पर चढ़ने के कारण कुछ लोग समाज में अपने को कुर्मी कहने में हिचकिचाते हैं। लेखक इसे गलत प्रवृत्ति मानता है।
“कहिया गर्व न कीजिए, कबहीं न होय कोई। अपूर्व नाव समुद्र में, का जाने का होय।”
अभिमान के कारण समाज के लोग कभी-कभी सामाजिक सहयोग से दूर रहते हैं। लेखक कृष्ण एवं राम के उदाहरण देकर मानवीय गुणों तथा मर्यादा की चर्चा करता है।
कहावत प्रचलित है— (क) जहाँ 5 कुर्मी वहाँ बात बढ़ी। (ख) कुर्मी, कुशा, चमन, हाथी-घोड़ा नहीं जाते एक ही साथ। (ग) पत्थर पर जो जाने कुर्मी, तबहु न एक होय कुर्मी। (घ) बैंग को स्पर्श और कुर्मी की पंचायत संभव नहीं। (ङ) कुर्मी, कुशा, मैसा, कुर्मी, मंदिर सदा अपनी जाति के लोगों से लड़ता है।
8. हमारे समाज के किसान आलसी हैं। वह और मेहनत से फसल लगातार दो-तीन वर्ष बर्बाद हो जाने के बाद भी हमारे ग्रामीण किसान एवं मजदूर खेती करना नहीं छोड़ते। यदि खेती खराब हो जाए तो समाज के उद्योगपतियों एवं नौकरीपेशा लोगों को समाज के अन्नदाता, खेती करने वाले किसानों तथा खेती-मजदूरों के विकास के लिए सहयोग करना चाहिए।
संपत्ति अर्जन में श्रम, पूंजी और सहयोग का महत्व बताया गया है। लेखक के अनुसार धनवान व्यक्तियों को समाज के गरीब और जरूरतमंद लोगों की सहायता करनी चाहिए।
9. इस जाति में देश-प्रेम की भावना कूट-कूट कर भरी हुई है। इसलिए यह जाति कभी-कभी गलत बातों में विश्वास नहीं करती। लेखक स्वतंत्रता आंदोलन और देशभक्ति से जुड़े लोगों के योगदान की चर्चा करता है तथा ऐसे लोगों को सम्मानित करने की आवश्यकता बताता है।
यह जाति शान्ति-प्रियता का विरोधी है। यही कारण है कि इस जाति के लोग करीब सभी जातियों एवं धर्मावलंबियों के साथ परिणाम-युद्ध में आबद्ध हो चुके हैं।
10. अधिकांश जातियों इस जाति को कमजोर समझती हैं, किन्तु यह जाति कमजोर के बजाय मिलनसार रहती है। समाज की आवश्यकता में खर्च करने से पीछे नहीं हटते। अपितु मिलनसार-संबंधी आवश्यकता से जुड़े अवसरों में भाग लेते हैं।
लेखक धार्मिक और सामाजिक परम्पराओं का उल्लेख करते हुए विभिन्न समुदायों के बीच आपसी सम्मान और सहयोग की आवश्यकता बताता है।
11. मुख्यतः यह कि इस जाति का कोई व्यक्ति गद्दार नहीं करता है। हमें अच्छा या खराब उदाहरण ढूँढ़ने पर भी बहुत कम मिलता है। लेखक के अनुसार समाज में ईमानदारी, भाईचारा और राष्ट्र के प्रति निष्ठा महत्वपूर्ण गुण हैं।
लेखक समाज के शिक्षित लोगों से अपेक्षा करता है कि वे स्वार्थ में डूबकर न रहें बल्कि सामाजिक विकास के लिए योगदान दें।
12. हमारी कृषि-भूमि फुटबॉल के सुराख से लीक करती हवा की तरह दिनोदिन सिकुड़ती जा रही है। 1960 के दशक में हमारे समाज में प्रति लड़का औसत खेत 3 एकड़ था जो 2000 में लगभग 50 प्रतिशत लोगों द्वारा गाँवों में रहने के बावजूद घटकर बहुत कम रह गया।
लेखक भूमि के छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजन, जनसंख्या वृद्धि और खेती की घटती आय को गंभीर समस्या बताता है। लगभग 2040 में औसत खेती और कम होने का अनुमान व्यक्त किया गया है।
हमारे समाज में लगभग 700 करोड़पति हैं जिनमें करीब 40 प्रतिशत व्यवसायी, नौकरीपेशा और अन्य क्षेत्रों में हैं। लेखक आर्थिक रूप से सम्पन्न लोगों से समाज के विकास में योगदान देने की अपेक्षा करता है।
13. यदि हमारे समाज को ताबड़तोड़ बढ़ने वाली आबादी मिली तो भविष्य में संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा। लेखक परिवार नियोजन और आर्थिक योजना की आवश्यकता पर जोर देता है।
शादी एम.ए. पास लड़की से करने का क्या लाभ? लेखक विवाह, शिक्षा, रोजगार और आर्थिक जिम्मेदारी के संबंध में समाज में प्रचलित धारणाओं पर चर्चा करता है। वह बताता है कि केवल डिग्री या नौकरी के आधार पर विवाह का निर्णय उचित नहीं है; सामाजिक, पारिवारिक और आर्थिक सामंजस्य भी आवश्यक है।
दहेज और विवाह में बढ़ते खर्च को समाज के लिए समस्या बताया गया है। लड़की और लड़के के परिवार पर आर्थिक दबाव, महंगे समारोह और दिखावे की प्रवृत्ति की आलोचना की गई है।
लेखक दहेज प्रथा के खिलाफ सामाजिक अभियान और सरल विवाह की आवश्यकता बताता है।
हमारे समाज के विरुद्ध अपराध संबंधी मामलों के उदाहरण भी दिए गए हैं। इनमें हत्या और अन्य गंभीर अपराधों से जुड़े कुछ मामलों तथा दोषियों को मिली सजा का उल्लेख है।
लेखक कुछ व्यक्तियों के नाम और घटनाओं का उल्लेख करते हुए बताता है कि अपराध के मामलों में समाज को कानून और न्याय-व्यवस्था पर भरोसा रखना चाहिए।
सामाजिक जीवन में शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और पारिवारिक जिम्मेदारियों का महत्व बताया गया है। तकनीकी शिक्षा, इंजीनियरिंग, चिकित्सा, सरकारी सेवा और निजी क्षेत्र में रोजगार के अवसरों की चर्चा है।
लेखक के अनुसार समाज में बेरोजगारी और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद नई पीढ़ी शिक्षा और तकनीकी प्रशिक्षण के माध्यम से आगे बढ़ रही है।
दहेज और विवाह खर्च कम करने तथा सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ सामूहिक प्रयास करने की आवश्यकता दोहराई गई है।
पृष्ठ पर कुछ व्यक्तियों तथा परिवारों से संबंधित घटनाओं का वर्णन जारी है। लेखक हत्या, अपराध और न्यायिक कार्रवाई से जुड़े उदाहरण देकर सामाजिक सुधार की आवश्यकता पर बल देता है।
“जनता हत्याओं के अपराध पीड़ित कार्य के लिये भविष्य, स्वस्थ जीवन की कामना करती है।”
इसके बाद रोजगार की स्थिति पर चर्चा है। उपयुक्त सामाजिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था तथा तकनीकी शिक्षा के अभाव में बेरोजगारी की समस्या बढ़ती है। समाज के युवक सरकारी नौकरी, निजी क्षेत्र, तकनीकी व्यवसाय तथा स्वरोजगार के माध्यम से आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं।
लेखक इंजीनियरिंग, तकनीकी शिक्षा, सरकारी सेवाओं और निजी कंपनियों में समाज के लोगों की भागीदारी का उल्लेख करता है।
लड़का और लड़की पक्ष वाले दोनों क्रमशः वेतनभोगी वर-वधू की तलाश करते हैं।
नौकरी वाले अभिभावक भी चाहते हैं कि उनके बच्चों का विवाह नौकरीपेशा परिवार में हो। लेखक इसे सामाजिक मानसिकता के रूप में प्रस्तुत करता है।
14. अपने समाज के तथाकथित नौकरीपेशा/बुद्धिजीवियों/धनिकों का व्यवहार सामान्यतः गरीब-अमीर के बीच की दूरी को बढ़ाता है। कुछ लोग पुत्री की शादी में 15 लाख रुपये खर्च करते हैं लेकिन गरीब के लिए 25 हजार भी खर्च नहीं करते।
लेखक भाई-बहन तथा परिवार के संबंधों में आर्थिक सहयोग की कमी पर आलोचना करता है। परिवार के सदस्य नौकरी लगने के बाद अपने गरीब रिश्तेदारों से दूरी बना लेते हैं।
पटना में अपने समाज के बुद्धिजीवी मकान तो बना रहे हैं, उनके पारिवारिक माहौल पर लेखक व्यंग्यात्मक दृष्टि डालता है। पुस्तकें पढ़ने, सामाजिक ज्ञान और समाज के प्रति रुचि कम होने की बात कही गई है।
लेखक स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक चेतना को केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामुदायिक जिम्मेदारी मानता है।
लेखक समाज में पारिवारिक विघटन, अलगाव और संयुक्त परिवार की कमजोर होती परंपरा पर चर्चा करता है। एक मकान में रहते हुए भी पुत्र वाले बाप-माँ का खाना अलग बनता है। माता-पिता और बच्चों के बीच संबंधों में दूरी बढ़ने का उल्लेख है।
भाई-भाई के विवाद, भूमि-जायदाद के बँटवारे, पति-पत्नी के झगड़े तथा पारिवारिक मुकदमों के कारण परिवारों के टूटने की समस्या बताई गई है। लेखक कहता है कि इससे परिवार और समाज दोनों कमजोर होते हैं।
एक पद्यांश: “शहर के काँटों में से अच्छे होते हैं गाँव के, भाव के बंधन से बेहतर माया-मोह के पाँव के। माता-पिता के दिलों पर क्यों करता तलवार वार, उस शहर के रास्ते में कटक कभी बनता नहीं।”
15. इस समाज का सबसे बड़ा दुर्गुण कृतघ्नता है—यानी किये गये उपकार को नहीं मानना। इसे उजागर करना अपने समाज की बुराई को पर्दाफाश करना है, किन्तु इसे समाज के हित में आवश्यक बताया गया है। लेखक का मत है कि बुराई सामने आएगी तभी सुधार संभव होगा।
यदि अगस्त 1942 के स्वतंत्रता-संग्राम में शहीद हमारे क्रांतिकारी योद्धा योगदान प्राप्त नहीं किये होते तो आज भी हम अंग्रेजों के गुलाम होते। लेखक स्वतंत्रता सेनानियों और उनके बलिदान को याद रखने की आवश्यकता बताता है।